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पुरी ही नहीं, देश-विदेश के इन शहरों में भी उमड़ती है भारी भीड़; जानिए अन्य प्रसिद्ध रथ यात्राओं का इतिहास
Published : 18-Jul-2026 04:07:30 PM
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ओडिशा के पुरी में निकलने वाली विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा के साथ-साथ भारत और दुनिया के कई हिस्सों में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथ पूरी भव्यता के साथ खींचे जाते हैं। पुरी के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी रथ यात्रा गुजरात के अहमदाबाद में निकाली जाती है। अहमदाबाद नगर निगम और गुजरात पर्यटन विभाग के आधिकारिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि इस यात्रा की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन साल 1878 में संत सारंगदासजी महाराज ने की थी। जमालपुर स्थित 400 साल पुराने जगन्नाथ मंदिर से शुरू होने वाली इस 14 किलोमीटर लंबी यात्रा की विशेषता यह है कि पुरी की तर्ज पर यहाँ भी लकड़ी के तीन विशाल रथ बनाए जाते हैं। यात्रा के शुभारंभ पर गुजरात के मुख्यमंत्री द्वारा सोने की झाड़ू से रास्ता साफ करने की पारंपरिक रस्में निभाई जाती है। इस भव्य आयोजन में 15 से अधिक सजे हुए हाथी, 100 से अधिक झांकियां और विभिन्न अखाड़े शामिल होते हैं, जिसमें लाखों लोग शामिल होते हैं।
इस पावन अवसर पर दिल्ली-एनसीआर के इलाकों में भी भक्ति का एक अनोखा रंग देखने को मिला, जहाँ प्रमुख आयोजनों और रूटों पर भक्तों की भारी भीड़ जुटी। इस्कॉन नोएडा (ISKCON Noida) द्वारा आयोजित यात्रा शाम 4:00 बजे सेक्टर-18 गुरुद्वारे से शुरू हुई, जो सेक्टर-18 मेट्रो स्टेशन, अट्टा पीर चौक, डीएम चौक, मोदी मॉल और एडोब चौराहा होते हुए इस्कॉन मंदिर तक पहुंची। इस यात्रा में फूलों से सजा 50 फीट ऊंचा आधुनिक हाइड्रोलिक रथ मुख्य आकर्षण का केंद्र रहा। इसी तरह, सेक्टर-121 स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से पुरी धाम की तर्ज पर पहली बार चार घोड़ों वाले विशेष रथ के साथ भव्य यात्रा निकाली गई, जो सेक्टर-71 स्थित बाबा बालकनाथ मंदिर (मौसी जी के घर) तक गई। यहाँ भगवान 9 दिनों तक विराजमान रहेंगे और 24 जुलाई 2026 को उनकी बहुडा यात्रा (वापसी यात्रा) निकाली जाएगी। इसके अलावा, देश की राजधानी दिल्ली के हौज खास (Hauz Khas) स्थित ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर से 48वीं भव्य रथ यात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों भक्त शामिल हुए। वहीं त्यागराज नगर (Thyagraj Nagar) के जगन्नाथ मंदिर से पहली बार तीनों भाई-बहनों के तीन अलग-अलग भव्य रथों के साथ ऐतिहासिक यात्रा निकली। इसके साथ ही रोहिणी सेक्टर-24 के जगन्नाथ मंदिर से उत्साहपूर्ण यात्रा निकाली गई और द्वारका इस्कॉन मंदिर के तत्वावधान में विशेष उत्सव मनाया गया, जहाँ भगवान को आमों का विशेष भोग लगाया गया।

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी कानपुर में भी 16 और 17 जुलाई 2026 को ऐतिहासिक और पारंपरिक जगन्नाथ रथ यात्राएं निकाली गईं, जबकि 19 जुलाई 2026 को इस्कॉन की ओर से भव्य रथ यात्रा का आयोजन प्रस्तावित है। कानपुर के जनरलगंज क्षेत्र में 216 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा के तहत श्री बाईजी मंदिर, उमा जगदीश और बिरजी भगत मंदिर से चांदी व रजत जड़ित रथों पर भगवान जगन्नाथ की भव्य यात्रा निकाली गई। इसके अलावा यशोदा नगर, किदवई नगर और बेहटा बुजुर्ग (भितरगांव) के स्थानीय मंदिरों से भी भव्य यात्राएं निकाली गईं। उत्तर प्रदेश के अन्य मुख्य शहरों की बात करें तो हापुड़ के पुराना बाजार स्थित प्राचीन शिव मंदिर से भगवान जगन्नाथ की 26वीं भव्य रथयात्रा निकाली गई, जिसमें भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। हरदोई में रामदत्त चौराहे से महाप्रभु श्री जगन्नाथ सेवा समिति के तत्वावधान में गाजे-बाजे के साथ रथयात्रा शुरू होकर नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरी, जबकि गाजीपुर के मुहम्मदाबाद क्षेत्र समेत अन्य स्थानों पर श्रद्धालुओं ने पूजन और दर्शन किए। वहीं अयोध्या शहर भी धार्मिक और ऐतिहासिक रथयात्राओं (जैसे राम रथयात्रा) का प्रमुख केंद्र रहा है, जहां वर्षभर विभिन्न उत्सवों पर धार्मिक जुलूस निकलते हैं।
इतिहास के झरोखे से देखें तो पश्चिम बंगाल के हुगली (श्रीरामपुर) में निकलने वाली 'महेश रथ यात्रा' को पुरी के बाद दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी रथ यात्रा का गौरव प्राप्त है। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग और स्थानीय मंदिर के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस रथ यात्रा का इतिहास 600 साल से भी अधिक पुराना है, जिसकी शुरुआत साल 1396 में महान बंगाली संत ध्रुवानंद ब्रह्मचारी ने की थी। 19वीं सदी में महान लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'राधारानी' में इस यात्रा का सजीव चित्रण किया था। महेश रथ यात्रा की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ का रथ लकड़ी का न होकर चार मंजिला स्थायी लोहे का है, जिसमें 12 लोहे के पहिये लगे हैं और इसकी ऊंचाई लगभग 50 फीट है। यहाँ भगवान जगन्नाथ को उनके मौसी के घर यानी 'मासीर बाड़ी' ले जाया जाता है।
पूर्वी भारत में झारखंड के रांची (धुर्वा) में आयोजित होने वाली रथ यात्रा का भी अपना एक खास ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। झारखंड सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के दस्तावेज बताते हैं कि इस यात्रा का इतिहास 300 वर्षों से अधिक पुराना है। नागवंशी राजा ठाकुर एनी नाथ शाहदेव ने साल 1691 में पुरी के मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित होकर रांची की पहाड़ी पर जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था। मुख्य मंदिर से आधा किलोमीटर दूर मौसी बाड़ी तक भगवान के रथ को खींचने के लिए लाखों आदिवासी और गैर-आदिवासी श्रद्धालु एक साथ जुटते हैं, जो सामाजिक समरसता की एक अनूठी मिसाल पेश करता है। यहाँ लगने वाला रथ यात्रा मेला आज झारखंड के सबसे बड़े सांस्कृतिक मेलों में गिना जाता है।
सनातन संस्कृति की यह पावन परंपरा केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, इस्कॉन के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने साल 1967 में सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में भारत से बाहर दुनिया की पहली रथ यात्रा का सफल आयोजन किया था। आज इसी परंपरा के तहत हर साल न्यूयॉर्क के सबसे व्यस्त और महंगे इलाके फिफ्थ एवेन्यू (Fifth Avenue) पर भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है, जो वाशिंगटन स्क्वायर पार्क पर जाकर संपन्न होती है। इसी तरह, लंदन के ऐतिहासिक ट्राफलगर स्क्वायर (Trafalgar Square) पर ब्रिटिश सरकार की विशेष अनुमति से तीन विशाल रथ निकाले जाते हैं, जहाँ हजारों विदेशी और भारतीय मूल के श्रद्धालु ढोल-मंजीरों की थाप पर झूमते हैं। इसके अलावा मॉस्को (रूस), सिडनी (ऑस्ट्रेलिया), टोरंटो (कनाडा) और जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) जैसे दुनिया के 100 से अधिक बड़े महानगरों में भी जगन्नाथ रथ यात्रा पूरी भव्यता के साथ निकाली जाती है, जो वैश्विक स्तर पर भारतीय आस्था और संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है।
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