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पुरी रथयात्रा 2026ः आस्था, संस्कृति और भक्ति का महापर्व
Published : 11-Jun-2026 02:50:50 PM
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श्री जगन्नाथ रथयात्रा की तैयारी जोरों शोरों पर चल रही है। रथयात्रा आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होती है। साल 2026 में यह रथयात्रा 16 जुलाई से 26 जुलाई तक संपन्न होगी। भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं। यह रथयात्रा भगवान जगन्नाथ मंदिर से लेकर गुंडीचा मंदिर तक आयोजित की जाती है। विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के प्रति भक्तों के भीतर अलग ही उत्साह देखने को मिलता है।
सदियों से चली आ रही पारंपरिक रथयात्रा की तैयारियाँ कई सप्ताह पहले ही शुरू हो जाती हैं। भगवान के रथों का निर्माण विशेष प्रकार की लकड़ी से किया जाता है और हर वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं। तीनों देवताओं के लिए अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, बलभद्र के रथ को तालध्वज और देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलन कहा जाता है।
रथयात्रा उत्सव की वास्तविक शुरूआत स्नान पूर्णिमा से ही हो जाती है, जिसमें भगवान का विशेष अभिषेक किया जाता है। 108 घड़ों से स्नान के बाद ऐसा माना जाता है कि भगवान बीमार हो जाते हैं इसलिए कुछ दिनों तक भगवान श्रद्धालुओं को दर्शन नहीं देते। इस अवधि को अनवसर कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान विश्राम करते हैं और फिर नवयौवन रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
रथयात्रा के दिन पुरी की सड़कों पर श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ता है। हजारों भक्त रथों की रस्सियों को खींचकर भगवान को गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं। लाखों-करोड़ों भक्त भगवान श्री जगन्नाथ के दर्शनों और उनके रथ की रस्सी को खींचने के लिए लालयित रहते हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथयात्रा की रस्सियों को खींचने से भगवान श्री जगन्नाथ का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह शुभता और समृद्धि का द्योतक है।
गुंडिचा मंदिर पहुँचने के बाद भगवान सात दिनों तक वहीं विराजमान रहते हैं। इसके बाद वापसी यात्रा, जिसे बहुदा यात्रा कहा जाता है, संपन्न होती है। लौटते समय भगवान मौसी माँ मंदिर में भी जाते हैं, जहाँ उन्हें विशेष भोग अर्पित किया जाता है। बहुदा यात्रा के साथ यह भव्य आयोजन अपने अंतिम चरण में पहुँचता है।
पुरी की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। इस आयोजन में जाति, भाषा, क्षेत्र और देश की सीमाएँ मायने नहीं रखती हैं। सभी श्रद्धालु एक साथ भगवान जगन्नाथ की भक्ति में डूबे दिखाई देते हैं। यही कारण है कि इसे विश्व के सबसे बड़े सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है।
हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुँचते हैं। मंदिर परिसर और पूरे शहर में भक्ति, उत्साह और श्रद्धा का अद्भुत वातावरण देखने को मिलता है। “जय जगन्नाथ” के उद्घोष के साथ निकलने वाली यह यात्रा भगवान और भक्त के बीच अटूट संबंध का प्रतीक मानी जाती है।
पुरी की रथयात्रा आज भी सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखते हुए लोगों को आस्था, एकता और सेवा का संदेश देती है। यही कारण है कि यह महापर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत उत्सव है।
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